नयी बात

Moshehar - Pixabay

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शाम में पार्क में चहल-पहल रहती थी, कोई नयी बात नहीं थी।

दोनों टहल रहे थे। “दादा जी प्रणाम, नमस्ते दादी जी”, कहते कोई जॉगिंग करता हुआ गुज़रा। दादा जी थोड़ी ऊँची आवाज़ में बोले, “खूब खुश रहो”।

गोल सोसाइटी के बीच में एक बड़ा पार्क था, बच्चे खेलते थे, झूले-झूलते थे, पेड़-पौधे थे।

दादी जी के सफ़ेद बालों से उनकी उम्र का अंदाज़ा लगाया जा सकता थ। दादा जी की झुर्रियों से भी।

“तुम्हे अजीब नहीं लगता, लोग हमें दादा-दादी बुलाते है?”, दादी जी ने पूछा।

“फिर क्या कहेंगे?”

दादी दादा जी की और देख रहीं थी, आखों में चमक थी, और प्यारी सी मुस्कान भी।

“तुम सब समझते हो, बस भोले बनते हो”

दादी जी के हाथ में एक थैली रोज़ होती थी, उसमे एक टिफ़िन का डब्बा होता था, उनके हाथ में एक गुलाब का फूल भी रोज़ होता था। पर आज कुछ चीज़ें नयी थीं, रोज़ की तरह आज दादा जी के बाल सफ़ेद नहीं थे, सुबह उनमे कुछ रसायन किया गया होगा। और आज उनके हाथ में एक डायरी थी, ये भी नयी बात थी। डायरी वैसे तो पतली थी, पर कई लिफ़ाफों और कागज़ों को उसके पन्नो के बीच फंसा दिए जाने के कारण, कोई मोटी किताब मालूम हो रही थी।

रोज़ दोनों चेहरों पर एक मुस्कान होती थी, आज दादा जी की मुस्कान में कुछ नयापन था।

दोनों एक बेंच पर बैठ गए, टिफ़िन और डायरी भी साथ बैठे। ढक्कन खुला, हलवे की खुशबू आयी, खायी गयी, तारीफ़ें सुनाई गईं, डब्बा बंद हुआ, फिर साथ बैठ गया।

“आज मैंने कमरे की सफ़ाई की”, दादा जी ने शुरू किया।

“स्कूल के समय का मेरा बक्सा निकला। हर साल निकलता है, मेरी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी, फिर भी मैंने उसे खोला, चलो कम-से-कम सफाई ही हो जायेगी”

दादी जी सुन रही थीं, कभी फूल को देखतीं, कभी खेलते बच्चों को, कभी डायरी-नरेश को।

“मेरी राइटिंग बहुत सुंदर हुआ करती थी। मेरे दोस्त, कभी उनके दोस्त, कहीं से दो-चार लाइनें ले आया करते थे, मेरा काम कार्ड और लेटर लिखने का होता था…”

“मैं शांत किस्म का था।”

“आज भी हो”, दादी जी मुस्कुराईं।

वैसे ये शांत स्वभाव सिर्फ दादा जी का नहीं था।

“मेरी तो कभी बात बनी नहीं, और अब लिखने बैठूं तो अपना नाम भी साफ न लिख पाऊं। इस डायरी में उन्हीं लाइनों को लिखा करता था, कभी एक ढंग से कभी दूसरे।”

“तुम्हारे लिए लाया हूँ…”

“ये कैसा बचपना है!”, दादी जी ने कहा, हँसते हुए डायरी छीन ली। बचपना भी सिर्फ़ दादा जी का नहीं था।

ऐसे हँस हँस के न देखा करो सब की जानिब,
लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

दादी जी ने पढ़ा, एक हाथ कुछ ऊपर उठाया और कहा “वाह!” एक पन्ने पर यह शेर और नीचे मजरूह सुल्तानपुरी का नाम लिखा था। सुंदर साफ अक्षर थे, उसी पन्ने में चार और तरह से ये लाइनें लिखी हुई थी। सारी सुंदर।

रोज़ की तरह बातें हुई, पर रोज़ की तरह हाल चाल नहीं पूछे गए, आज तबीयत की बातें नहीं की गईं, आज कहानियाँ सुनाई गईं, ये भी नयी बात थी।

दोनों के घरों के बीच पार्क था, बच्चे खेलते थे, ये पुरानी बात थी।

दादी जी का दादा जी को छत से गार्डनिंग करते देखना, पुरानी बात थी।

दादा जी का फूलों में पानी देते हुए दादी जी को निहारना भी पुरानी बात थी।

उसने जब मुझसे किया, अहदे वफा आहिस्ता,
दिल के वीराने में इक फूल खिला, आहिस्ता

डॉ. शफ़ी हसन की लाइनें लिखी दो बार गयी थी, पढ़ी कई बार गईं।